हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 9 मोहर्रम और हज़रत अबा अब्दिल्लाहिल हुसैन (अ) और उनके साथियों की शहादत के ग़मग़ीन दिनो पर, हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) की शहादत की एक रिवायत आयतुल्लाह ख़ामेनेई के तेहरान में 14 अप्रैल 2000 ई. को दिए गए जुमे की नमाज़ के ख़ुत्बे से बयान की गई है, जो इस प्रकार है:
हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) की वफ़ादारी सबसे अधिक इसी घटना में प्रकट होती है कि वे फ़ुरात के किनारे तक पहुँचे, लेकिन उन्होंने पानी नहीं पिया। यद्यपि एक प्रसिद्ध रिवायत आम तौर पर प्रचलित है कि इमाम हुसैन (अ) ने हज़रत अबुल फ़ज़्ल (अ) को पानी लाने के लिए भेजा था, लेकिन मैंने जिन प्रामाणिक पुस्तकों — जैसे "इरशाद" (शेख़ मुफ़ीद) और "लहूफ़" (इब्ने ताऊस) — का अध्ययन किया है, उनमें यह घटना कुछ भिन्न रूप में वर्णित है, जो शायद इस घटना के महत्व को और भी बढ़ा देती है।
इन प्रामाणिक पुस्तकों में वर्णन मिलता है कि अंतिम क्षणों में बच्चों, छोटी बच्चियों और अहले हरम पर प्यास इतनी अधिक हावी हो गई थी कि स्वयं इमाम हुसैन (अ) और अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) दोनों साथ मिलकर पानी की तलाश में निकले। हज़रत अबुल फ़ज़्ल (अ) अकेले नहीं गए थे, बल्कि स्वयं इमाम हुसैन (अ) भी उनके साथ थे और वे दोनों शरिआ-ए-फ़ुरात की ओर बढ़े, ताकि शायद पानी प्राप्त कर सकें।
ये दोनों बहादुर और शक्तिशाली भाई, एक-दूसरे का सहारा बनकर युद्धभूमि में लड़े। एक ओर इमाम हुसैन (अ) हैं, जिनकी आयु लगभग साठ वर्ष है, लेकिन शक्ति और वीरता में उनका कोई सानी नहीं। दूसरी ओर उनके छोटे भाई, लगभग तीस से चौंतीस वर्ष के हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) हैं, जिनके गुणों से सभी परिचित हैं। ये दोनों भाई, कंधे से कंधा मिलाकर, कभी एक-दूसरे की रक्षा करते हुए, दुश्मनों के समुद्र के बीच से सेनाओं की पंक्तियों को चीरते हुए आगे बढ़े, ताकि फ़ुरात के पानी तक पहुँच सकें और पानी ला सकें। इसी भीषण युद्ध के दौरान अचानक इमाम हुसैन (अ) को महसूस हुआ कि दुश्मनों ने उनके और उनके भाई अब्बास (अ.) के बीच दूरी पैदा कर दी है।
इसी संघर्ष के दौरान हज़रत अबुल फ़ज़्ल (अ) पानी के निकट पहुँच गए और स्वयं को नदी के किनारे तक ले गए। जैसा कि वर्णित है, उन्होंने मश्क में पानी भरा ताकि उसे ख़ेमों तक पहुँचा सकें। यहाँ हर इंसान अपने आपको यह अधिकार दे सकता था कि एक मुट्ठी पानी अपने प्यासे होंठों तक पहुँचा ले, लेकिन उन्होंने यहाँ अपनी वफ़ादारी का अद्वितीय प्रदर्शन किया।
जब हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) ने पानी उठाया और उनकी नज़र उस पर पड़ी, तो "फ़ज़कर अत्तश अल-हुसैन" — उन्हें इमाम हुसैन (अ) के प्यासे होंठ याद आ गए। शायद उन्हें बच्चों और बच्चियों की "अल-अतश, अल-अतश" की पुकार याद आ गई, शायद अली असगर (अ) की प्यास की चीख़ उनके मन में गूँज उठी। उनका दिल गवारा न कर सका कि वे पानी पी लें।
उन्होंने पानी को ज़मीन पर गिरा दिया और वापस चल पड़े। इसी वापसी के दौरान वे घटनाएँ घटीं, और इमाम हुसैन (अ) ने अचानक अपने भाई की आवाज़ सुनी, जो दुश्मन की सेना के बीच से पुकार रहे थे:
"या अख़ा अदरिक अख़ाक" अर्थात्, "ऐ भाई! अपने भाई की सहायता के लिए पहुँचिए।"
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